विवेक कुमार शॉ




साल 1936 में, जब महात्मा गांधी बैंगलोर, कर्नाटक यात्रा पर आए, तो नंदी हिल्स की शांत, शीतल वायु और प्राकृतिक सौंदर्य ने उन्हें भी आकर्षित किया था। अपने चिकित्सक डॉ. जीराज मेहता की सलाह पर उन्होंने अस्थमा व उच्च रक्तचाप से मुक्ति पाने के लिए इसी भवन में लगभग डेढ़ महीने का विश्राम किया। इस अल्पकालिक, किंतु महत्त्वपूर्ण प्रवास को सम्मान देते हुए इस भवन का नाम ‘गांधी निलय’ रखा गया।
यह छोटा सा भवन आज भी गांधीजी की स्मृतियों को संजोए हुए है। हाल ही में इसका जीर्णोद्धार किया गया है और इसे विशिष्ट अतिथियों के लिए अतिथिगृह के रूप में उपयोग किया जाता है। परंतु यही वह जगह है जहाँ एक बोर्ड लगा हुआ है — “PUBLIC ENTRY RESTRICTED”।
जबकि नंदी हिल पर टीपू सुल्तान का विश्राम भवन, वीरांजनेय मंदिर, टीपू ड्रॉप और पलार नदी का उद्गम स्थल सभी आम जनता के लिए खुले हैं। प्रतिदिन हजारों युवा इन स्थलों पर इतिहास को छूने और समझने आते हैं, वहीं गांधी निलय आज भी आम नागरिकों से दूर, प्रतिबंधित बना हुआ है।
एक युवा की दृष्टि में यह केवल एक भवन नहीं, बल्कि एक महानायक के चिंतन, संघर्ष और विश्राम का साक्षी है। नंदी हिल्स की पहाड़ियों पर घूमते हुए युवा पीढ़ी को यह अवसर अवश्य मिलना चाहिए कि वे बापू की इस स्मृति स्थली को देखें, समझें और उससे प्रेरणा लें।
मैं इस जगह के इतिहास से पहले से परिचित था, इसलिए सीधे गेस्ट हाउस के अंदर चला गया। लेकिन जिन्हें इसका इतिहास नहीं मालूम, वे बाहर लगे बोर्ड पर लिखी सूचना पढ़कर ही लौट जाते होंगे। संभवतः उन्हें यह एहसास भी नहीं होता कि वे गांधीजी की स्मृतियों से जुड़े एक महत्वपूर्ण स्थल के सामने खड़े हैं।
अंदर जाते ही बापू की मूर्ति दिखाई दी। उसके नीचे कन्नड़ और अंग्रेज़ी में एक विवरण लिखा था, जिसे अधिकांश युवा शायद देख ही नहीं पाते। उसमें उल्लेख था कि सन् 1927 और 1936 में महात्मा गांधी जी बैंगलोर यात्रा के दौरान इसी भवन में ठहरे थे। अपने चिकित्सक डॉ. जीराज मेहता की सलाह पर गांधीजी ने अस्थमा और उच्च रक्तचाप से उबरने के लिए यहाँ 45 दिनों तक विश्राम किया था।
विवरण में यह भी लिखा था कि गांधीजी के इस छोटे से भवन में ठहरने के सम्मान में इसका नाम गांधी निलय रखा गया है। भवन का हाल ही में जीर्णोद्धार किया गया है और वर्तमान में इसे विशेष अतिथियों के लिए अतिथिगृह के रूप में उपयोग किया जा रहा है।
यहाँ एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से मन में उठता है—क्या गांधीजी की स्मृतियों से जुड़ा यह स्थल केवल विशिष्ट अतिथियों तक सीमित रहना चाहिए? या फिर इसे उन युवाओं, विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और नागरिकों के लिए भी अधिक सुलभ बनाया जाना चाहिए जो गांधीजी के जीवन और विचारों को समझना चाहते हैं?
गांधी निलय केवल एक भवन नहीं, बल्कि इतिहास का एक जीवंत साक्ष्य है। यदि इसे संरक्षित रखने के साथ-साथ आम लोगों के लिए भी आंशिक रूप से खोला जाए, तो यह आने वाली पीढ़ियों को गांधीजी के जीवन और उनके विचारों से जोड़ने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।





