विवेक कुमार साव

11 सितंबर, भूदान आंदोलन के प्रणेता और स्वतंत्रता सेनानी आचार्य विनोबा भावे की जयंती पर विशेष।)
आचार्य विनोबा भावे का जीवन केवल विचारों का नहीं, बल्कि विचारों को जीवन में उतारने का निरंतर प्रयोग था। पवनार आश्रम उसी प्रयोग की प्रयोगशाला था – जहाँ ज्ञान और श्रम, विद्वत्ता और सेवा, पुरुष और स्त्री के बीच कोई कृत्रिम दीवार नहीं थी। यहाँ भूख लगने वाले को रसोई का काम भी आना चाहिए, गरीबी के विरुद्ध लड़ने वाले को पहले कुदाल उठानी चाहिए और समानता की बात करने वाले को पहले स्वयं श्रम में उतरना चाहिए। ये बात सिर्फ उपदेश व विचार नहीं, बल्कि आश्रम का रोजमर्रा का जीवन था, जो निरंतर जारी है। मैंने, विनोबा जी के दौर से ही पवनार आश्रम में निवास कर रहे वरिष्ठ सदस्यों (बहनों) से विस्तृत साक्षात्कार किए। बहनों के अनुभवों में विनोबा जी के व्यक्तित्व, आश्रम की दिनचर्या और उस युग की सादगी व सीख दोनों जीवंत हो उठे। ये संस्मरण न केवल विनोबा जी के विचारों को समझाते हैं, बल्कि यह भी बताते हैं कि कैसे वे विचारों को व्यवहार में ढालते थे। नीचे उन्हीं साक्षात्कारों से चुने गए कुछ महत्वपूर्ण प्रसंग प्रस्तुत है –
- पवनार आश्रम में एक महत्वपूर्ण बात हुई। एक विद्वान भाई, विनोबा जी से मिलने आए। विनोबा जी ने उनसे पूछा, “क्या आप खाना खाएंगे?” भाई ने ‘हाँ’ कहा, तो विनोबा जी ने कहा, “तो चलिए, रसोई में मदद कीजिए।” भाई रसोई में गए, लेकिन उन्हें रसोई का कोई काम नहीं आता था। वह विद्वान तो थे, लेकिन रसोई के काम से अनजान थे। रसोई संचालक जब उन्हें कुछ करने के लिए कहते, तो भाई को कुछ समझ नहीं आता। रसोई संचालक हैरान व परेशान हो गए और कहा, आप जाइए, रसोई संचालक ने विनोबा जी से कहा, आपने ऐसे व्यक्ति को रसोई में क्यों भेजा? उन्होंने जिंदगी में कभी काम ही नहीं किया है। विनोबा जी ने मुस्कराते हुए कहा, मुझे पता है, वह बहुत बड़े विद्वान हैं, लेकिन भूख तो उनको भी लगती है। जिसको भूख लगती है, उसे खाना बनाना भी आना चाहिए। क्या सिर्फ बहनें ही खाती हैं? भाई लोगों को भी पहले काम करना चाहिए।
- एक दिन, गौतम जी बजाज को काका साहब कालेलकर जी ने एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव दिया। उन्होंने कहा, “गौतम जी, तुम्हारी बुद्धिमत्ता और क्षमता को देखते हुए, मैं चाहता हूँ कि तुम भारत और जापान के बीच एक सेतु का काम करो। इसके लिए, मैं तुम्हें जापानी भाषा सीखने की सलाह देता हूँ।” गौतम जी बजाज ने इस प्रस्ताव के बारे में विनोबा जी से परामर्श किया। उन्होंने कहा, “बाबा, काका साहब कह रहे हैं कि मुझे जापान भेजा जाएगा और मैं जापानी सीखूं, जिससे भारत और जापान को जोड़ने का एक अच्छा काम हो सकता है।” बाबा विनोबा ने गौतम जी की बात सुनी और कहा, जापानी बाद में सीखना, पहले जाकर ज्वारी की रोटी बनाना सीखो।
- एक बहुत प्रसिद्ध भाई ने विनोबा जी से कहा कि मैं गरीबी के विरुद्ध लड़ना चाहता हूँ, उनको लगा कि विनोबा जी कुछ विशेष बताएंगे। बाबा ने कहा – पहले कुदाल उठाओ, और जाकर खेत में काम करो। उनके कहने का अर्थ था कि इस क्षेत्र में उतरेंगे तभी आपको पता चलेगा।
◆महाराष्ट्र की कुछ बहनें पवनार आश्रम में आने वाली थीं, और उन्होंने पहले से ही जानकारी दी थी कि वे आश्रम की बहनों के साथ दिनभर रहना चाहती हैं और उनके जीवन को करीब से देखना चाहती हैं। वे विचार-विमर्श करना चाहती थीं और आश्रम की गतिविधियों को समझना चाहती थीं, लेकिन जब उन्होंने अपनी योजना के बारे में बताया, तो आश्रम की एक बहन ने कहा, आप बहुत अधिक लोग हैं, हम इतने लोगों का खाना नहीं बना पाएंगे। इस पर आगंतुक बहनों ने कहा, “हम बस से आएंगे और अपना खाने का डिब्बा लेकर आएंगे।” उस समय, आश्रम में एक टॉयलेट था जो भर गया था। जब टॉयलेट भर जाता था, तो उसे छोड़ दिया जाता और लगभग छह महीने बाद, जब वह मिट्टी जैसा बन जाता, तो बहनें और भाई उसे निकालकर खेत में डाल देते थे, इसे ही स्वर्ण खाद कहा जाता है। आश्रम में कालिंदी बहन को इस काम की जिम्मेदारी दी गई थी, और कई अन्य बहनें भी इस काम में शामिल थीं। उषा दीदी, जो अब 94 साल की हैं, ने कहा, आश्रम आने वाली बहनें 9 बजे आने वाली हैं, मैं साढ़े आठ बजे के करीब जाऊंगी और नहा-धो कर फिर आ जाऊंगी। उस दिन, आश्रम की बहनें खाद डालने में व्यस्त थीं। वे गढ्ढे में उतरकर खाद निकाल रही थीं, उसे ढकेल गाड़ी में डाल रही थीं, और फिर उसे खेत में ले जा रही थीं। यह कार्य सब मिलकर कर रहे थे, लेकिन तभी आगंतुक बहनें अचानक आधा घंटा पहले ही आ गईं। आश्रम की बहनें कार्य जल्दी-जल्दी करने लगीं, क्योंकि उन्होंने अभी तक स्नान भी नहीं किया था। एक बहन ने आगंतुकों को बताया, “हम क्षमा चाहते हैं, थोड़ी देर में आपके पास आते हैं। हम खाद डालने का काम कर रहे थे। बरामदे में हमने दरी बिछाया है, आप लोग वहाँ बैठें।” आगंतुक बहनें बरामदे में बैठ गईं और आश्रम की बहनें जल्दी से तैयार होकर उनके पास आयीं। दिनभर उनके साथ बातें हुईं, मिलना-जुलना हुआ, विचार-विमर्श हुआ। आगंतुक बहनें विभिन्न क्षेत्रों में प्रसिद्ध थीं, जैसे कि साहित्य, शिक्षा, सेवा, राजनीति आदि। जब वे जाने लगीं, तो उन्होंने आश्रम की बहनों से कहा, हम समानता की बात करते हैं, लेकिन हमने प्रत्यक्ष समानता देखी। आप लोगों ने बहुत अच्छी बातें बतायी। हमारे ऊपर सबसे अधिक असर इस बात का पड़ा कि हम मिलकर कैसे श्रम कर सकते हैं।
(लेखक लाल बहादुर शास्त्री गवर्नमेंट फर्स्ट ग्रेड कॉलेज, कर्नाटक में शिक्षक हैं।)







