तुषार अरुण गांधी से विवेक कुमार साव की बातचीत

वंदे मातरम् को लेकर हाल के दिनों में फिर से तीखा विवाद छिड़ा है। एक तरफ कांग्रेस 1937 के ऐतिहासिक फैसले पर अटल है, जिसमें केवल पहले दो छंद गाने का निर्णय लिया गया था। दूसरी तरफ भाजपा पूरे गीत को अनिवार्य बनाने की दिशा में बढ़ चुकी है। इस संवाद में तुषार गांधी बताते हैं कि बापू, सुभाषचंद्र बोस, रवींद्रनाथ टैगोर, नेहरू, मौलाना आज़ाद और आचार्य नरेंद्र देव जैसे नेताओं ने क्यों केवल दो छंदों को ही चुना। बातचीत में वे इस मुद्दे के राजनीतिकरण, अलगाववादी नीतियों और राष्ट्रप्रेम के असली मापदंड पर भी खुलकर बोलते हैं। आइए, पढ़ते हैं गांधी जी के प्रपौत्र और लेखक तुषार गांधी की ज़बानी वंदे मातरम् का वह संदेश, जो एकता का प्रतीक है –
विवेक – वर्ष 1937 में, (जब वंदे मातरम् के पहले दो छंद गाने की बात कही गई थी) महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस, रवींद्रनाथ टैगोर, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अब्दुल कलाम आजाद और आचार्य नरेंद्र देव जैसे नेताओं की भूमिका क्या थी? क्या आप मानते हैं कि उस फैसले को आज भी कायम रखना चाहिए? और क्यों?
तुषार गांधी – 1937 में जब वंदे मातरम् के पहले दो छंद गाने की बात चली थी, तब बापू महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, रवींद्रनाथ टैगोर, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और आचार्य नरेंद्र देव जैसे दिग्गज नेताओं ने इस पर विचार-विमर्श किया। इसके बाद यह तय किया गया कि वंदे मातरम् के पहले दो छंदों को ही राष्ट्रीय गीत के रूप में गाया जाना चाहिए। क्योंकि उसके बाद के छंदों का उस समय कोई महत्व नहीं था और आज भी उनका कोई तात्पर्य या महत्व दिखाई नहीं देता। उनमें एक धार्मिकता की बात आ जाती है और वह भी केवल एक ही वर्ग की धार्मिकता की। जब हमारे संविधान में हमने धर्मनिरपेक्षता और सर्वधर्म समभाव की बात कही है, तो स्वतंत्र भारत में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय जी ने अपने उपन्यास में शामिल किए गए बाकी छंदों की न तो 1937 में कोई आवश्यकता थी और न ही आज भारत में उनका कोई महत्व है।
हाँ, संघ के लोगों के लिए उसका महत्व हो सकता है, क्योंकि उनकी पूरी विचारधारा मुसलमान-विरोधी है। मुसलमानों को निशाना बनाने के लिए ही भाजपा सरकार ने यह कानून बनवाया है, जिसमें पूरा वंदे मातरम् गाना अनिवार्य होगा और उसका आदर न करने पर सज़ा तथा शिक्षा का प्रावधान किया गया है। यह इसलिए किया गया है क्योंकि यह जानकारी है कि संपूर्ण वंदे मातरम् में जिस तरह एक धार्मिकता को लाया गया था, वह हमारी सर्वधर्म समभाव की भावना के विरुद्ध है। उसी बात को समझकर, जब आज़ादी के समय सबको एक साथ रखने की आवश्यकता थी, तो उस तत्व को ध्यान में रखते हुए उस समय के दिग्गज नेताओं ने यह तय किया कि गीत के पहले दो छंद, जिनमें भारतवर्ष का बहुत बखूबी और सुंदर वर्णन किया गया है तथा जिन्हें गाने में किसी भी भारतीय को कोई एतराज न हो, वो मद्देनजर रख, तय किया गया था।
इस फैसले को रवींद्रनाथ टैगोर ने भी, जो एक महान कवि थे, वंदे मातरम् का अध्ययन करने के बाद सराहा था और उसका समर्थन किया था कि हाँ, पहले दो छंद ही पर्याप्त हैं और बाकी छंदों को इसमें शामिल करने की कोई आवश्यकता नहीं है। जिस रवींद्रनाथ टैगोर, गुरुदेव ने हमारा नेशनल एंथम लिखा और उसे संगीतबद्ध किया, उन्होंने ही वंदे मातरम् को भी संगीतबद्ध किया था। उनका भी समर्थन था कि केवल दो छंद ही आवश्यक हैं और उन दो छंदों से किसी की भावनाओं या धार्मिकता को ठेस नहीं पहुँचेगी। आज जो किया जा रहा है, वह धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने, आहत करने और एक समुदाय को निशाना बनाने के लिए है। इसमें न तो कोई राष्ट्रप्रेम है और न ही कोई राष्ट्रीय अभिमान। इसमें केवल एक हीन भावना है, जिससे अलगाववाद पैदा किया जाए और मुसलमान समाज तथा मुसलमान समुदाय को निशाना बनाया जाए।
विवेक – हाल ही में कांग्रेस ने 1937 के प्रस्ताव को दोहराते हुए सिर्फ दो छंद गाने का फैसला किया है, जबकि बीजेपी पूरा गीत गाने की बात कर रही है। आप इस पूरे विवाद को कैसे देखते हैं? क्या वंदे मातरम् के पूरे छंद को अनिवार्य करने की जरूरत है?
तुषार गांधी – कांग्रेस ने अपनी सीडब्ल्यूसी की बैठक में जो फैसला किया कि वंदे मातरम् के पहले दो छंद ही गाए जाएंगे, वह उसकी परंपरा के अनुरूप है। जिस परंपरा को उसने आज़ादी से पहले से ही सबको एक साथ लेकर चलने वाली भावना को महत्व देकर अपनी पूरी नीतियों में अपनाया था, उसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि कांग्रेस ने फिर से उसी अपनाए हुए विश्वास, अपनी परंपरा व अपनी नीति पर अटल रहने का निर्णय लिया है और यह सराहनीय है।
भाजपा ने भी अपनी अलगाववादी नीतियों का ही समर्थन करते हुए बाकी के छंदों को भी गाना अनिवार्य बना दिया है। ये दो विरोधी विचारधाराएँ हैं – एक तो वह जो सचमुच सबको साथ लेकर चलने की परंपरा से आयी है, यानी कांग्रेस; और दूसरी वह, जो आरएसएस का राजनीतिक विंग है और आरएसएस की अलगाववादी तथा निशाना बनाने वाली नीतियों को आगे बढ़ा रही है। दोनों अपनी-अपनी परंपराएँ चला रहे हैं। कांग्रेस की परंपरा से ही इस देश का संगठन हुआ, विभाजन के बावजूद। जबकि भाजपा की परंपरा में उन्होंने बाकी समुदायों के लोगों को कभी पूर्णतः भारतीय नहीं माना, जाति में भी भेदभाव किया। उसी भेदभाव की राजनीति को आगे बढ़ाते हुए, जब उनके पास सत्ता है, उन्होंने यह कानून लाया है कि संपूर्ण वंदे मातरम् गाना चाहिए। यहाँ मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि किसी एक गीत को गाने से किसी के राष्ट्रप्रेम, वफ़ादारी या भक्ति का मूल्यांकन करना गलत है। व्यक्ति किस तरह राष्ट्र के संविधान के साथ जुड़ा रहता है, कैसे देश के क़ानूनों का पालन करता है, और सार्वजनिक परंपराओं का सम्मान करता है – इन सब बातों से ही लोगों के राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रीय वफ़ादारी का मूल्यांकन होना ज़्यादा ज़रूरी है। लेकिन भाजपा से यह उम्मीद रखना मिथ्या है। इसीलिए हम बार-बार और लगातार देख रहे हैं कि जब उनकी सरकार है, तो किसी-न-किसी तरीके से वे अल्पसंख्यकों – चाहे मुसलमान हों, ईसाई हों या सिख, सबको आतंकित करके रखने की नीति का इस्तेमाल कर रहे हैं।
विवेक – साल 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति के फैसले को कुछ लोग तुष्टिकरण कहते हैं, कुछ संवेदनशीलता का उदाहरण। आप इसे किस नज़रिए से देखते हैं?
तुषार गांधी – वर्ष 1937 का जो फैसला कांग्रेस ने किया, मैंने पहले भी कहा कि वह उसकी सबको साथ लेकर चलने की नीति और भावना के कारण था। हाँ, आज के दौर में जब अलगाववादी विचार हमारा राष्ट्रधर्म बनता जा रहा है, तब उसे (एक साथ मिलकर चलने की भावना को) तुष्टीकरण का नाम देकर हीन दिखाने की कोशिश हो, इसमें मुझे कोई ताज्जुब नहीं लगता। यह बात संघ/आरएसएस और भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने शुरू की। सर्वधर्म समभाव को तुष्टीकरण का नाम देकर अलगाववादी नीतियों को सार्वजनिक रूप से चलाना और मोदी जी ने सरकार बनते ही उसे अपनी नीति बना ली।
मुझे नहीं लगता कि कांग्रेस ने तुष्टीकरण की नीति से यह किया है। यह सबका सम्मान और सबका साथ की नीति का नतीजा है, जो कांग्रेस की परंपरा है। जैसा कि मैंने कहा, भाजपा की परंपरा अलगाववादी है। वह उच्च वर्णीय हिंदुओं को ज़्यादा प्राथमिकता देती है और इसीलिए ऐसी सब बातें, जिनसे समाज को बाँटा जा सके, उसे प्रोत्साहित करती है।
विवेक – 7 अगस्त, 1905 को जब सभी समुदायों के हजारों विद्यार्थियों ने मिलकर वंदे मातरम् का नारा लगाते हुए स्वदेशी की प्रतिज्ञा ली थी, तब यह नारा एकता का प्रतीक बना था। आज वंदे मातरम् को लेकर चल रही बहस क्या उसी ऐतिहासिक एकता की भावना को मजबूत कर रही है, या यह विभाजन को बढ़ावा दे रही है?
तुषार गांधी – मैं फिर से यही बात कहूँगा कि 7 अगस्त 1905 की स्वदेशी की शपथ और उसमें वंदे मातरम् के नारे के साथ शपथ लेना हमारी आज़ादी का एक बहुत महत्वपूर्ण अवसर था। वह सबके साथ की एकता और एकात्मता का प्रतीक बनकर उभरा। उसी से वंदे मातरम् को जो दर्जा मिला, उसके बाद स्वतंत्रता संग्राम के हर आंदोलन की शुरुआत वंदे मातरम् से होती थी। कांग्रेस के हर अधिवेशन में और हर कार्यक्रम में वंदे मातरम् गाया जाता था। उसके पहले दो छंद ही गाए जाते थे। वह हमारे राष्ट्रप्रेम और अविभाजित राष्ट्रप्रेम का एक प्रतीक था।
भाजपा ने जिस तरह इस मुद्दे को उठाया है और बार-बार जब भी भाजपा व उसके साथियों ने मुसलमानों या मुसलमान नेताओं को किसी-न-किसी तरीके से उकसाने की कोशिश की है, तो उन्होंने वंदे मातरम् का इस्तेमाल किया है। अगर उन्हें वंदे मातरम् में सच्ची आस्था होती, तो वे उसे कभी शस्त्र के रूप में इस्तेमाल नहीं करते। क्योंकि उसका इस्तेमाल करके कट्टरपंथी मुसलमान नेताओं से उसका अपमान करवा लेने की भी एक हीन भावना भाजपा रखती है, ताकि वे कह सकें कि देखो, मुसलमान कभी अपने नहीं थे। यही उनकी चाल है, और यह वंदे मातरम् के प्रति उनकी तथाकथित आस्था का पर्दाफ़ाश करती है।
विवेक – अगर महात्मा गांधी आज के भारत में होते, तो वंदे मातरम् को लेकर चल रही वर्तमान बहस पर उनकी क्या प्रतिक्रिया होती?
तुषार गांधी – अगर बापू आज होते तो वंदे मातरम् के राजनीतिकरण पर उन्हें बहुत दुःख और खेद होता। वे इसके बारे में बोलते और इसका विरोध करते। वे कहते कि यह भावनात्मक संदेश है, मात्र एक गीत नहीं। यह लोगों के प्रेम और राष्ट्रीय भावना का एक प्रतीक है। इसका इस तरह राजनीतिक उपयोग नहीं होना चाहिए। जिस तरह भाजपा उसे राजनीति का एक शस्त्र बनाकर इस्तेमाल करती आयी है और उससे पहले आरएसएस करती आयी है, उसकी बापू टीका करते। वे कहते कि कुछ चीज़ें ऐसी होनी चाहिए जिन पर राजनीति न की जाए। यह बात वे ज़रूर अपनी प्रार्थना सभाओं और सार्वजनिक संवादों में कहते आते। एक आदरणीय गायन की, जिस तरह भाजपा द्वारा अवहेलना की जा रही है, उसके लिए वे भाजपा और संघ की भी आलोचना करते।
Interviewer :
Dr. Vivek Kumar Shaw is a teacher at Lal Bahadur Shastri Government Arts, Science & Commerce College, Bengaluru, Karnataka.




