जय जगत् के संदेशवाहक बालविजय जी

26 फरवरी, 1926 को महाराष्ट्र के भंडारा जिले में जन्मे श्री बालविजयजी के बालमन में बचपन से ही अध्यात्म, देशभक्ति और निःस्वार्थ सेवा के संस्कार मिलें। यही संस्कार उनके जीवन की मूल धुरी बन गए। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त करने के बाद उनका जीवन तब करवट लेता है, जब वे आचार्य विनोबा भावे की भूदान यात्रा से जुड़ते हैं। विनोबाजी के सान्निध्य में आजीवन ब्रह्मचर्य का संकल्प लेकर उन्होंने देशभर में यात्राएं की। उन्होंने पदयात्रा के माध्यम से भूदान-ग्रामदान के संदेश को गाँव-गाँव, घर-घर तक पहुँचाया। खादी मिशन के संयोजक के रूप में उन्होंने खादी, स्वदेशी और आत्मनिर्भरता के आदर्श को नई ऊर्जा दी। धार्मिक हिंसा और साम्प्रदायिक तनाव के दौर में आचार्यकुल के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने संवाद, प्रेम और अहिंसा की सेतु-रचना की, जिससे अनेक स्थानों पर सौहार्द और शांति की लौ फिर से जली।


सन् 1985 में पवनार की विनोबा समाधि से दिल्ली के राजघाट तक की प्रबोधन पदयात्रा ने समाज में जागृति की नई लहर पैदा की।
परंतु उनकी सबसे यादगार और महत्त्वपूर्ण यात्रा रही – ‘जयजगत मैत्री यात्रा’। 2 अक्टूबर 1994 से ठीक तीन वर्ष बाद 2 अक्टूबर 1997 तक चलने वाली यह यात्रा विश्व-मैत्री, मानवता और एकता का जीवंत संदेश बनकर उभरी। बालविजय जी की महानता व सादगी का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि पीवी नरसिंहराव और डॉ. मनमोहन सिंह जैसे दिग्गज प्रधानमंत्री भी उनसे सलाह लेते थे। लेकिन उन्होंने कभी इसका ढिंढोरा नहीं पीटा। हमेशा सफेद खादी वस्त्र धारण कर रहने वाले इस शख्स का व्यक्तित्व शब्दों में नहीं बयां किया जा सकता। ऐसे महान कर्मयोगी, त्याग और तप का प्रतीक श्री बालविजयजी का 18 मार्च को दोपहर 12:30 बजे परलोक-प्रस्थान हो गया। आदरणीय बालविजय जी के ब्रह्मलीन होने का समाचार हृदय को गहरा आघात देने वाला है। यह हमारे लिए अथाह शोक का क्षण है। साथ ही अफसोस की बात यह भी है कि बालविजय जी का निधन भारतीय मीडिया की नजरों से मानो ओझल हो गया है। आज की युवा पीढ़ी और वर्तमान राजनीति के चाणक्य शायद मानों उन्हें जानते भी नहीं। उन्हें जानना है तो विनोबा भावे को अवश्य जानना होगा। क्या देश की मीडिया ने विनोबा के विचारों को इतनी जल्दी भुला दिया? श्री बालविजय जी, आचार्य विनोबा भावे के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी, खादी आंदोलन के अटूट स्तंभ, कर्मयोग के जीवंत प्रतीक,“जय जगत्” के संदेशवाहक और उनके निजी सचिव थे, उन्होंने अपने शताब्दीपूर्ण जीवन को समर्पण, सादगी और विश्व-शांति की अहिंसक ज्योति से आलोकित किया। हाल ही में उन्होंने अपने जीवन के 100वें वर्ष को पूर्ण किया था। मुझे भी यह सौभाग्य प्राप्त हुआ कि कई बार उनके सान्निध्य में समय बिताने का अवसर मिला। हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा से पवनार आश्रम जब भी आता, तो कई बार वे विनोबा निवास के निकट उस हरी पटरी वाली साधारण-सी बेंच पर अक्सर बैठे मिलते, नेत्र अर्ध-निमीलित, मन किसी अनंत ध्यान में लीन, मानो समय और संसार दोनों से परे, केवल “जय जगत्” की ध्वनि में ही जीवित हैं। मुझे अभी भी वह समय बहुत स्पष्ट याद है – पिछले साल, 26 फरवरी को, जब वे अपने जीवन के 99वें वर्ष में प्रवेश कर रहे थे। मैं विशेष रूप से उनसे मिलने पवनार आश्रम पहुँचा था। उनके पास बैठकर कुशल-क्षेम पूछा, उनके आशीर्वाद और स्नेह की अनुभूति ली। बहुत धीमे, किंतु मधुर स्वर में उन्होंने कहा था, “विनोबा जी ने हमें सत्य, प्रेम, करुणा बताया है। इन मूल्यों को अपने जीवन में मूल बना लो… यह ध्यान रखना।

बालविजय जी की दृष्टि में जय जगत का मेनिफेस्टो –
बालविजय जी ‘जय जगत्’ के गहन अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहते हैं – सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत्॥ यह प्राचीन श्लोक मानव जीवन की चार सूत्री (चतुःसूत्री) नींव प्रस्तुत करता है। इसका सार है- संसार के प्रत्येक प्राणी को सुख, स्वास्थ्य, कल्याण मिले और सभी को दुःख से मुक्ति मिले। इस विषय में बालविजय जी का मानना था कि यहाँ सुख का अर्थ केवल भौतिक सुख-सुविधाएँ या ऐश्वर्य-विलास नहीं। उनके अनुसार, वास्तविक सुख तभी संभव है, जब प्रत्येक व्यक्ति को भौतिक, सामाजिक, आर्थिक और आध्यात्मिक स्तर पर जीवन की मूलभूत आवश्यकताएँ सहज रूप से उपलब्ध हों। साथ ही, सर्वे सन्तु निरामयाः का अर्थ है – सभी शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ और रोगमुक्त रहें। चित्त के विकारों – क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, भय आदि से मुक्त होकर शांत और निर्मल बने रहें। वे बताते हैं कि यही ‘जय जगत्’ का मूल मेनिफेस्टो है। एक ऐसा विश्व दृष्टिकोण, जो संकीर्ण राष्ट्र, जाति या समुदाय तक सीमित न रहकर पूरे मानव-जगत को समेटता है। इस कौल का प्रथम उद्घोष आचार्य विनोबा भावे ने नवंबर 1957 को कर्नाटक के तुमकूर जिले की यात्रा के दौरान किया था। बालविजय जी के अनुसार ‘जय’ शब्द यहाँ किसी की हार-जीत या संकीर्ण विजय का प्रतीक नहीं है। इसतरह ‘जय जगत्’ का अर्थ है – पूरी सृष्टि को शाश्वत शांति, समृद्धि, न्याय और समता से परिपूर्ण, गौरवपूर्ण एवं वैभवशाली बनाना। अतः वे मानते थे कि हमारा वैचारिक आधार वैश्विक हो, हृदय विशाल हो, तभी सच्चा ‘जय जगत्’ संभव है। उनके शब्दों में – विनोबा कहते थे “Think globally act locally”। यानी चिंतन वैश्विक हो लेकिन उसका क्रियान्वयन अपने निकटवर्ती क्षेत्र से प्रारंभ हो।
बालविजय जी ‘धर्म के सार ग्रंथों का महत्व’ बताते हुए कहते हैं कि विनोबा भावे क्रांतिदर्शी हैं। उनकी दृष्टि बहुत स्पष्ट और गहरी थी, वे मानते थे कि यदि आध्यात्मिकता और नैतिक मूल्यों की मजबूत नींव के बिना कोई भी प्रगति या विकास किया जाए, तो वह विकास नहीं, बल्कि समाज में नई-नई जटिलताएँ, असंतुलन और विकृतियाँ पैदा करने का कारण बन जाता है। ऐसी प्रगति मनुष्य को अधिक सुखी नहीं, बल्कि अधिक उलझन भरे और अर्थहीन जीवन की ओर धकेल देती है। वे इस सत्य को भी खुले मन से स्वीकार करते थे कि विज्ञान का मार्ग अब रुकने वाला नहीं है। न तो इसे रोका जा सकता है, और न ही रोकना उचित होगा क्योंकि इसमें छिपी शक्ति और संभावनाएँ असाधारण हैं। लेकिन ठीक यही कारण है कि विज्ञान की इस अपार शक्ति को सही दिशा में लगाना आज की सबसे बड़ी चुनौती और सबसे बड़ा कर्तव्य भी है। अतः विज्ञान को सार्थक और मानव-कल्याणकारी बनाना चाहिए। बालविजय जी जीवनमूल्यों का ऐसा प्रसार चाहते थे, जो न केवल बौद्धिक स्तर पर सही हो, बल्कि हृदय को भी स्पर्श करे, चरित्र को निखारे और समाज को सच्चे अर्थों में स्वस्थ, संवेदनशील व सौहार्दपूर्ण बनाए।

About the Author

Dr. Vivek Kumar Shaw
Assistant Professor
HKBK Degree College
Bengaluru, Karnataka

Leave a Reply