हिंसा के दौर में गांधी : सत्य, संवाद और मानवीयता की प्रासंगिकता

डॉ ० लिलू कुमारी

महात्मा गांधी को केवल भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख नेता के रूप में देखना उनके विचारों की व्यापकता को सीमित कर देना होगा। गांधी का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि उन्होंने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध जनआंदोलन का नेतृत्व किया, बल्कि इस बात में भी है कि उन्होंने राजनीति को सत्य, नैतिकता, आत्मसंयम, अहिंसा और मानवीय गरिमा से जोड़ने का प्रयास किया। आज का भारत विविध भाषाओं, धर्मों, संस्कृतियों और विचारों वाला लोकतांत्रिक समाज है। ऐसे समय में गांधी को याद करना किसी व्यक्ति की पूजा करना नहीं, बल्कि उन प्रश्नों पर पुनर्विचार करना है जिनसे हमारा समाज आज भी जूझ रहा है—हम असहमति के बीच कैसे साथ रहें, अन्याय का विरोध कैसे करें और संघर्ष के बीच भी मनुष्यता को कैसे बनाए रखें।

गांधी के विचारों में अहिंसा का स्थान केंद्रीय था। उनके लिए अहिंसा केवल शारीरिक हिंसा से बचने का नाम नहीं थी, बल्कि सत्याग्रह और अन्याय के विरुद्ध सक्रिय प्रतिरोध से जुड़ी हुई थी। गांधी का मानना था कि अन्याय को स्वीकार करना अहिंसा नहीं है; अन्याय का विरोध आवश्यक है, लेकिन विरोधी के प्रति घृणा को संघर्ष का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। 13 दिसंबर 1945 को गांधी ने लिखा, “Violence is the weapon of the weak; non-violence that of the strong.” गांधी हेरिटेज पोर्टल इस कथन को The Collected Works of Mahatma Gandhi, खंड LXXXII, पृष्ठ 447 से जोड़ता है। गांधी के लिए साधन और लक्ष्य भी एक-दूसरे से अलग नहीं थे। वे मानते थे कि न्यायपूर्ण लक्ष्य तक पहुँचने के लिए अपनाए गए साधन भी नैतिक होने चाहिए। आज जब असहमति कई बार व्यक्तिगत कटुता और सामाजिक तनाव में बदल जाती है, तब गांधी का यह विचार लोकतांत्रिक संवाद के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा करता है कि क्या हम अपने विचार पर दृढ़ रहते हुए भी दूसरे व्यक्ति की गरिमा का सम्मान कर सकते हैं।

गांधी के संबंध में एक और विवादित प्रश्न यह है कि क्या वे केवल मुसलमानों के पक्ष में थे। इतिहास को इस एक वाक्य में समेटना उचित नहीं है। गांधी हिंदू-मुस्लिम एकता और विभिन्न समुदायों के अधिकारों के पक्षधर थे, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि वे मुस्लिम लीग की प्रत्येक राजनीतिक मांग के समर्थक थे। उनके जीवन के अंतिम वर्षों की घटनाएँ इस विषय को अधिक स्पष्ट करती हैं। 1946 में नोआखाली में सांप्रदायिक हिंसा के बाद गांधी वहाँ गए और हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों में रहे। उसी समय बिहार में मुसलमानों के विरुद्ध हिंसा हुई तो गांधी ने वहाँ भी हस्तक्षेप किया। मार्च 1947 में पटना पहुँचने के बाद उन्होंने मुस्लिम लीग के नेताओं और विभिन्न मुस्लिम प्रतिनिधियों से मुलाकात की तथा 6 मार्च को Muslim Relief Fund के लिए धन एकत्र करना शुरू किया। गांधी हेरिटेज पोर्टल के कालक्रम में इन घटनाओं का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। यह तथ्य गांधी की भूमिका को समझने में महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे दिखाई देता है कि उनका सार्वजनिक हस्तक्षेप किसी एक समुदाय की राजनीतिक पक्षधरता के बजाय सांप्रदायिक हिंसा को रोकने और पीड़ितों के साथ खड़े होने से जुड़ा था। इसलिए गांधी को केवल “मुसलमान समर्थक” या “हिंदू विरोधी” जैसे सरल राजनीतिक लेबल में सीमित करना उनके कार्यों की जटिलता को पर्याप्त रूप से नहीं समझाता।

गांधी और भगत सिंह का संबंध भी भारतीय इतिहास के सबसे अधिक चर्चा किए जाने वाले विषयों में से एक है। गांधी और भगत सिंह की राजनीतिक पद्धतियाँ अलग थीं। गांधी अहिंसक सत्याग्रह के समर्थक थे, जबकि भगत सिंह और उनके साथियों ने क्रांतिकारी संघर्ष का रास्ता अपनाया। गांधी भगत सिंह की हिंसक राजनीतिक पद्धति से सहमत नहीं थे, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि उन्होंने उनकी देशभक्ति को नकार दिया। गांधी हेरिटेज पोर्टल के कालक्रम के अनुसार, 29 मार्च 1931 को गांधी ने भगत सिंह को बहादुर और देशभक्त बताया, साथ ही हिंसा के रास्ते के विरुद्ध अपनी असहमति व्यक्त की।

भगत सिंह की फाँसी के प्रश्न पर भी प्रमाण और धारणा के बीच अंतर करना आवश्यक है। गांधी हेरिटेज पोर्टल के अनुसार, 23 मार्च 1931 को गांधी ने वायसराय को पत्र लिखकर भगत सिंह और उनके दो साथियों की मृत्यु-दंड की सज़ा पर पुनर्विचार और सज़ा कम करने का अनुरोध किया था। 26 मार्च को कराची में उन्होंने भगत सिंह और उनके साथियों को बचाने के अपने प्रयासों के बारे में भी बात की। इसलिए यह कहना कि गांधी ने भगत सिंह को बचाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया, उपलब्ध प्राथमिक दस्तावेजों से मेल नहीं खाता। दूसरी ओर, यह दावा भी प्रमाणित नहीं है कि गांधी निश्चित रूप से फाँसी रुकवा सकते थे। अंतिम निर्णय ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार के अधिकार में था। इसलिए इस घटना को समझने का अधिक प्रमाण-आधारित तरीका यही है कि गांधी और भगत सिंह के वैचारिक मतभेद को स्वीकार किया जाए, गांधी के हस्तक्षेप के दस्तावेजों को देखा जाए और यह भी स्वीकार किया जाए कि अंतिम निर्णय गांधी के नियंत्रण में नहीं था।

आज के भारत में गांधी की अहिंसा की प्रासंगिकता इसी संदर्भ में सामने आती है। आज हिंसा केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं है। शब्दों के माध्यम से अपमान, अफवाहों का प्रसार, डिजिटल माध्यमों पर घृणा और असहमति को व्यक्तिगत शत्रुता में बदल देना भी सामाजिक संबंधों को प्रभावित कर सकता है। ऐसे वातावरण में गांधी की अहिंसा को नए संदर्भ में समझने की आवश्यकता है। अहिंसा का अर्थ अन्याय को स्वीकार करना नहीं, बल्कि अन्याय का दृढ़ता से विरोध करते हुए भी मनुष्य के प्रति घृणा को संघर्ष का आधार न बनाना है। लोकतंत्र में विचारों का अलग होना स्वाभाविक है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज की मजबूती इस बात से भी निर्धारित होती है कि वह अपने से भिन्न विचार रखने वाले व्यक्ति के अधिकार और गरिमा का कितना सम्मान करता है।

डिजिटल युग में गांधी का सत्य का आग्रह भी विशेष महत्व रखता है। किसी सूचना को सत्यापित किए बिना आगे बढ़ाना, किसी समुदाय के बारे में सामान्यीकृत आरोप लगाना या केवल इसलिए किसी दावे को स्वीकार कर लेना क्योंकि वह हमारी अपनी धारणा के अनुकूल है, सामाजिक अविश्वास को बढ़ा सकता है। गांधी का सत्य और आत्मसंयम का आग्रह हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि किसी बात को स्वीकार करने और आगे बढ़ाने से पहले उसकी सत्यता की जाँच करना भी नागरिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। सत्य केवल अपने पक्ष की बात को सही सिद्ध करना नहीं, बल्कि अपनी धारणाओं की भी जाँच करने का साहस है।

गांधी को आज पढ़ने का अर्थ उनके प्रत्येक विचार से सहमत होना नहीं है। उनके राजनीतिक निर्णयों, सामाजिक विचारों और ऐतिहासिक भूमिका की आलोचनात्मक समीक्षा की जा सकती है और की जानी चाहिए। किसी ऐतिहासिक व्यक्ति की आलोचना लोकतांत्रिक और बौद्धिक प्रक्रिया का हिस्सा है; लेकिन आलोचना और तथ्यहीन आरोप एक ही बात नहीं हैं। गांधी को समझने का अधिक विश्वसनीय तरीका उनके लेखन, पत्रों, भाषणों और समकालीन दस्तावेजों को पढ़ना है। इससे गांधी को न तो देवता बनाने की आवश्यकता पड़ती है और न ही खलनायक के रूप में प्रस्तुत करने की।

गांधी हमारे सामने कुछ कठिन प्रश्न छोड़ जाते हैं—क्या साधन और लक्ष्य को अलग किया जा सकता है? क्या अन्याय का विरोध बिना घृणा के किया जा सकता है? क्या बहुमत की शक्ति के साथ अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा संभव है? क्या राजनीतिक असहमति के बावजूद हम एक-दूसरे की मानवीय गरिमा को स्वीकार कर सकते हैं? आज के भारत में इन प्रश्नों की प्रासंगिकता समाप्त नहीं हुई है।

गांधी का महत्व केवल उनकी प्रतिमा, तस्वीर, जयंती या सरकारी कार्यक्रम तक सीमित नहीं है। उनका वास्तविक महत्व तब सामने आता है जब समाज हिंसा के स्थान पर संवाद, घृणा के स्थान पर मानवीय गरिमा, प्रतिशोध के स्थान पर न्याय और असत्य के स्थान पर सत्य को महत्व देने का प्रयास करता है। गांधी की अहिंसा निष्क्रियता का संदेश नहीं देती; वह अन्याय के विरुद्ध नैतिक और सक्रिय प्रतिरोध का मार्ग प्रस्तुत करती है। इसी तरह गांधी और भगत सिंह के बीच वैचारिक अंतर को स्वीकार करते हुए भी दोनों के योगदान को समझा जा सकता है। नोआखाली और बिहार की घटनाएँ यह भी बताती हैं कि सांप्रदायिक हिंसा के प्रश्न को केवल “किसके पक्ष में थे” जैसे सरल प्रश्न में नहीं समेटा जा सकता।

इसलिए गांधी को समझने का सबसे ईमानदार तरीका शायद यही है कि न उन्हें देवता बनाया जाए और न खलनायक; बल्कि उनके मूल दस्तावेजों को पढ़ा जाए, उनके निर्णयों की आलोचनात्मक जाँच की जाए और यह विचार किया जाए कि सत्य, अहिंसा, संवाद और मानवीय गरिमा आज हमारे समाज के लिए क्या अर्थ रखते हैं। आज के भारत में गांधी की प्रासंगिकता किसी एक राजनीतिक विचार का समर्थन करने में नहीं, बल्कि इस कठिन प्रश्न में है कि असहमति, विविधता और संघर्ष के बीच हम एक-दूसरे की मनुष्यता को कैसे बचाए रख सकते हैं। यही प्रश्न गांधी को इतिहास के पन्नों से निकालकर वर्तमान भारत के सामने खड़ा करता है।

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