जहर से बची गांधीजी की जान – बतख मियाँ की साहसिक कहानी

दिसंबर 1916 के अंतिम दिनों (26 से 30 तक) लखनऊ में कांग्रेस का अधिवेशन अम्बिकाचरण मजूमदार की अध्यक्षता में हुआ। इसी ऐतिहासिक सत्र के दौरान महात्मा गांधी की मुलाकात ऐसे साधारण किंतु अपनी बातों पर अटल रहने वाले व्यक्ति से हुई, जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा प्रदान की। उस व्यक्ति का नाम था – राजकुमार शुक्ल।यह सीधे-सादे, मगर अपनी बातों पर अटल रहने वाले किसान ने गांधीजी को चंपारन के नील किसानों की दयनीय दशा और अंग्रेजों द्वारा उनके साथ हो रहे अमानवीय शोषण की मार्मिक कहानी सुनाई। उन्होंने बापू से बार-बार आग्रह किया कि वे इस अन्याय को दूर करने के लिए चंपारन पधारें।

गांधीजी ने उनकी बात ध्यान से सुनी और अपने स्वभावानुसार उत्तर दिया, बिना स्वयं जाकर देखे वे इस विषय पर कोई राय नहीं दे सकतें। उन्होंने राजकुमार शुक्ल को कांग्रेस के मंच से अपनी बात रखने के लिए कही।राजकुमार शुक्ल को कांग्रेस से सहानुभूति की तो अपेक्षा थी ही। ब्रजकिशोर प्रसाद ने चंपारन की समस्या को सदन के समक्ष रखा और एक सहानुभूति प्रस्ताव भी सर्वसम्मति से पारित हो गया। इस प्रस्ताव से राजकुमार शुक्ल प्रसन्न अवश्य हुए, किंतु उनका मन अभी भी अशांत था।वे गांधीजी को स्वयं चंपारन ले जाना चाहते थे, ताकि बापू खुद वहाँ की पीड़ा को प्रत्यक्ष देख सकें। अंततः गांधीजी ने कहा, अपने आगामी भ्रमण में वे चंपारन को भी शामिल करेंगे और वहाँ एक-दो दिन अवश्य ठहरेंगे।यह छोटी-सी मुलाकात इतिहास में एक बड़े आंदोलन की शुरुआत बन गई।

15 अप्रेल, 1917 को महात्मा गांधी बिहार राज्य के चंपारण जिले के मोतिहारी पहुँचे। विविध गाँवों से आये हुए नीलबागान के किसानों ने उनका सादर स्वागत किया। उस समय नीला रंग तैयार करने वाले कारखानों के लिए चंपारण मशहूर था।अधिकांश नीलरंग कारखानों और नीलबागानों के मालिक अंग्रेज थे और भारतीय लघु व मध्यम स्तर के किसान थे। अंग्रेज शासन में अंग्रेज मालिकों का वश चलता था। भारतीय किसानों में अधिकांश पट्‌टेदार एवं साझेदार थे।जमीन एवं कारखाने अंग्रेजों के अधीन में रहने के कारण नीलबागान और नीलारंग तैयारी से लाभान्वित होने के लिए गोरे मालिक चंपारन किसानों के हितों के खिलाफ आचरण करने लगे। खासकर तीन कठिया जैसे कानून लादे गए थे।इस तीन कठिया कानून के विषय में गांधीजी अपनी आत्मकथा में लिखते हैं -“चंपारन के किसान अपनी ही जमीन के 3/20 भाग में नील की खेती उसके असल मालिकों के लिए करने के कानून से बँधे हुए थे। इसे वहाँ तीन कठिया कहा जाता था। बीस कट्ठे का वहाँ एक एकड़ था और उसमें से तीन कट्ठे जमीन में नील बोने की प्रथा को तीन कठिया कहते थे।”(पाँचवां भाग, नील का दाग)गोरे नील-मालिकों के शोषण और अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने पर किसानों को उनके कारिंदों की निर्दयता सहनी पड़ती थी।इसी विकट स्थिति से व्यथित चंपारण के किसानों की पुकार सुनकर राजकुमार शुक्ल, पीर मुहम्मद मुनीस जैसे कई संवेदनशील नेताओं के बारंबार आग्रह पर महात्मा गांधी मोतिहारी आए। वहाँ किसानों ने नील-बागान मालिकों के क्रूर कृत्यों की हृदयविदारक कहानियाँ सुनाईं।

इसके बाद गांधीजी ने अहिंसा के बल पर सत्य की खोज का अपना प्रयोग देश में आरंभ किया।” इससे डरकर महात्मा गांधी को चंपारन से हटाने के लिए गोरे मालिकों ने निर्णय लिया।

गोरे मालिकों में दुष्ट के रूप मे विख्यात इर्विन ने इस मामले मे दखल होकर साजिस की। उस साजिस के अनुसार महात्मा गांधी को अपने घर दावत मे बुलाकर विषाहार से उनका अंत करना चाहता था।हमारे आँखो को अपने उंगलियों से ही ठोसवाकर अपना षणयंत्र पूरा करने की योजना बनायी गयी। अपने घर का बावर्ची बतखमियाँ अंसारी (1867-1957) को योजना मे शामिल किया गया। उन्हें बुलाकर अपने घर दावत में आने वाले महात्मा गांधी को दूध में जहर मिलाकर देने का हुक्म दिया गया। इस आज्ञा को पालन करने में संकोचते हुए बतख मियाँ को भारी इनाम से मालामाल करने का, वेतन बढ़ाने का, जमीन हस्तगत करने का प्रलोभन इर्विन ने किया।उन्होने आज्ञा के उल्लंघन के बुरे एवं भयानक परिणाम को भोगने की चेतावनी भी दी। अत्यंत क्रूर के रूप में विख्यात गोरे मालिक की दुष्टता एवं क्रोध से अवगत बतख मियाँ अंसारी किसी प्रकार का जवाब दिये बिना खामेश रह गये।(गांधीजी के प्राणरक्षक बतखमियाँ अंसारी, सय्यद नशीर अहम्मद, पेज-5) लेकिन जब बतख मियाँ, महात्मा गांधी के समक्ष पहुँचे तो ठिठक गए। उनके हृदय में भय और संकोच का भारी बोझ था। विष मिला भोजन रखने की सोच भी उनमें न थी।गांधीजी की करुणा-भरी दृष्टि उन पर पड़ी तो बतख़ मियां का मन पिघल उठा। आँसुओं की धारा बही और मौन टूट गया, सामने रखा वह पदार्थ जहर था, एक सुनियोजित हत्या का माध्यम।

उन्होंने बापू को सब कुछ बता डाला
चंपारण सत्याग्रह के दौरान महात्मा गांधी को जहर देकर मारने की साजिश विफल हो गई, तो ब्रिटिश नेता इरविन अपने बावर्ची बतखमियाँ अंसारी पर क्रोध से भर गया क्योंकि उसने आज्ञा मानने के बजाय सत्य उजागर कर बापू की जान बचा ली थी।इस क्रोध के कारण बतखमियाँ को क्रूर शारीरिक यातना, नौकरी से बेदखली, संपत्ति जब्ती, घर की नीलामी और पुलिस उत्पीड़न झेलना पड़ा।अंततः पूरा अंसारी परिवार अपने गाँव को छोड़कर मजबूरन पलायन कर गया।इस प्रकार, चंपारण सत्याग्रह के दौरान अंग्रेजों द्वारा महात्मा गांधी को जहर देने की कुटिल साजिश को बतख मियाँ अंसारी के निडर साहस और नि:शंक भाव ने विफल कर दिया।गोरे मालिकों के मृत्यु-प्रहार से गांधीजी की रक्षा करने वाले देशभक्त बतख मियाँ चंपारण की जन-धारा में खोकर अमर हो गए।हर साल 30 जनवरी को गांधी शहादत दिवस पर हम ज्यादातर गोडसे गैंग विचार से जुड़े लोगों की आलोचना करते हैं, लेकिन इस बीच हम बहुत महत्वपूर्ण बात भूल जाते हैं – बापू को मारने वाले से कहीं अधिक याद किए जाने लायक हैं वे लोग जो उन्हें बचाने के लिए आगे आए, जो उनके साथ खड़े थे।आज के इस दौर में, जब समाज में हिंदू-मुसलमान के बीच दूरियाँ बढ़ाने की लगातार कोशिशें हो रही हैं, तब बतख मियाँ अंसारी की कहानी को और अधिक जोर-शोर से लोगों तक पहुँचाना चाहिए।

यह दुःखद है कि हमारी नयी गोडसे का नाम तो अच्छी तरह जानती है, लेकिन बतख मियाँ अंसारी जैसे नायक के बारे में बहुत कम या बिल्कुल नहीं जानती। इसलिए आज, गांधी शहादत दिवस के दिन, हमारा फर्ज बनता है कि हम सिर्फ़ हत्या की कहानी नहीं, बल्कि बापू को बचाने वाली उस इंसानी मोहब्बत और देशभक्ति की कहानी भी सबको सुनाएँ, जो बतख मियाँ अंसारी ने 1917 के चंपारण सत्याग्रह में दिखाई थी, जब उन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर गांधीजी को जहर देने की साजिश को नाकाम कर दिया था। यह कहानी मोहब्बत, एकता व मानवता की मिसाल है और यही वह संदेश है जो आज के समय में सबसे ज्यादा जरूरी है।

About the Author

Dr. Vivek Kumar Shaw
Assistant Professor
HKBK Degree College
Bengaluru, Karnataka

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